अस्तित्व बनाम विकास (20 मार्च: विश्व गौरैया दिवस)

अस्तित्व बनाम विकास (20 मार्च: विश्व गौरैया दिवस)

अस्तित्व बनाम विकास (20 मार्च: विश्व गौरैया दिवस पर खास)

        पक्षी बनूं उड़ती फिरूं मैं मस्त गगन में,

        आज मैं आज़ाद हूं दुनिया के चमन में.....!

हसरत जयपुरी की इस रचना को लता जी सुरों और शंकर जयकिशन के संगीत ने लोगों के दिलों में ही बावस्ता नहीं किया बल्कि प्रकृति के इस नायाब तोहफे को जीवन के आयामों से जोड़ दिया। यही नहीं परिंदों ने ही राइट बंधुओं को स्वछंद आकाश में उड़ान भरने को प्रेरित किया, जिसका परिणाम आज हवाई जहाज के रूप में मानव जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। यहाँ तक कि परिंदे संदेश वाहक का भी काम किया करते थे। समय बदला और संचार माध्यमों में परिवर्तन के साथ ये संदेश वाहक बस कहानियां और किस्सों तक ही सीमित हो गए।

विडंबना देखिए कि जिन परिंदों ने मनुष्य को जीवन के नए आयामों से परिचित कराया….आज वो ही अपने अस्तित्व को बचाने में असहाय हो गए, इस संदर्भ में आज हम बात करेंगे एक प्यारे से पंछी की….. जी हां! आप सही समझ रहे हैं, बात हो रही है बचपन में हमारे आंगन में फुदकने वाली नन्हीं प्यारी गौरैया की, जो आने वाले समय में गुजरे जमाने की बात होकर रह जाने की कगार पर है। यदि यही दशा रही तो आने वाली पीढियां इस सुन्दर जीव का दीदार बस किताबों और चलचित्रों में कर पाएंगे….इनको सजीव देखना, इनको समझना, इनके साथ जीवन जीना महज़ कोरी कल्पना बनकर ही रह जायेगा।

गौरैया का सामान्य परिचय:

घरेलू गौरैया (पासर डोमेस्टिकस) एक पक्षी है जो यूरोप और एशिया में सामान्य रूप से हर जगह पाया जाता है। इसके अतिरिक्त पूरे विश्व में जहाँ- जहाँ मनुष्य ने खुद को स्थापित किया, इसने उनका अनुकरण किया और अमेरीका के अधिकतर स्थानों, अफ्रीका के कुछ स्थानों, न्यूज़ीलैंड और आस्ट्रेलिया तथा अन्य नगरीय बस्तियों में अपना नीड़ बनाया। इनकी लम्बाई 14 से 16 सेंटीमीटर होती है तथा इनका वजन 25 से 32 ग्राम तक होता है। एक समय में यह कम से कम तीन अण्डे देती है। गौरैया अधिकतर झुंड में ही रहती है। भोजन तलाशने के लिए गौरैया का एक झुंड अधिकतर दो मील तक की दूरी तय करता है। यह पक्षी कूड़े में भी अपना भोजन ढूंढ़ लेते है।

शहरी इलाकों में गौरैया की छह तरह की प्रजातियां पाई जाती हैं। ये हैं हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो। इनमें हाउस स्पैरो को गौरैया कहा जाता है। लोग जहाँ भी घर बनाते हैं देर- सबेर गौरैया के जोड़े वहाँ रहने पहुँच ही जाते हैं।

भारत में गौरैया को विभिन्न नामों से पुकारा जाता है। उर्दू में गौरैया को चिड़िया, सिंधी भाषा में झिरकी, भोजपुरी में चिरई तो बुन्देली में चिरैया भी कहा जाता है। जम्मू और कश्मीर में चेर, पंजाब में चिड़ी, पश्चिम बंगाल में चरूई, ओडिशा में घरचटिया, गुजरात में चकली, महाराष्ट्र में चिमानी, कर्नाटक में गुब्बाच्ची, आन्ध्र प्रदेश में पिच्चूका, केरल व तमिलनाडु - कूरूवी नाम से पुकारा जाता है।

आखिर क्यों विलुप्तता की कगार पर है ये सुन्दर जीव?

गाँवों में भी अब छप्पर के आशियानों की जगह पक्के मकानों ने ले ली, जहाँ गाँवों में बाग हुआ करते वहां अब चंद पेड़ ही दिखते हैं। हमने जंगलों के दोहन में भी कोई कसर नहीं छोड़ी…..अब ज़रा सोचिए क्या ये सब करते वख्त हमने एक बार भी इन बेजुबान परिंदों के बारे में सोचा है क्या?

ये तो महज़ आशियाने की बात हुई। एक बहुत बड़ा कारक है भोजन, आज के मशीनी युग में परम्परागत अनाज कटाई विधि के स्थान की जगह उपकरणों ने ले ली है जिससे बहुत कम मात्र में ही आनाज छिटककर खेतों में रह पाता है जिसका सीधा असर इन परिंदों पर भी पड़ा है।       

गौरैया पर प्रभाव के प्रमुख कारक:

  • जन और जल की कमी: घर में अब महिलाएं न तो गेहूं सुखाती हैं न ही धान कूटती हैं, जिससे उन्हें छत पर खाना नहीं मिलता।
  • घोसलों के लिए उचित स्थानों की कमी: तेज़ी से कटते पेड़- पौधे और उजड़ते जंगल और कच्चे मकानों की जगह पक्के मकानों का निर्माण।
  • गौरैया अपने बच्चों को शुरुआती 10 से 15 दिन सिर्फ कीड़े- मकोड़े ही खिलाती है, परन्तु खेतों से लेकर शहरों में घरेलू पेड़ पौधों में भी कीटनाशक का अधाधुंध प्रयोग हो रहा है, जिससे उनमें कीड़े नहीं लगते और इस प्रकार इनके बच्चों को समुचित भोजन नहीं मिल पाता। गौरैया चिड़िया जब कीटनाशकों के प्रभाव से उपजे अनाज को खाती है तो इससे उसको (गॉट) नामक बीमारी हो जाती है। जिससे गौरैया की किडनी खराब हो जाती है, जो गौरैया विलुप्ति का एक मुख्य कारण है। अतः आवासीय ह्रास, अनाज में कीटनाशकों के इस्तेमाल, आहार की कमी और मोबाइल फोन तथा मोबाइल टॉवरों से निकलने वाली सूक्ष्म तरंगें गौरैया के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही हैं।

आज मनुष्य के स्वार्थ ने प्रकृति के संतुलन को इतना बिगाड़ दिया कि आज इस संतुलन को बनाये रखने के लिए हमें इनको एक दिन समर्पित करना पड़ रहा है। इसी क्रम में 20 मार्च को विश्व गौरैया दिवस के रूप में इनके संरक्षण, सुरक्षा और पुनर्वास के लिए तय किया गया है। 

कब हुई विश्व गौरैया दिवस की शुरुआत:

आज से आज से 8 वर्ष पहले इसकी शुरुआत प्रथम विश्व गौरैया दिवस के रूप में, नेचर फ़ॉर एवर सोसाइटी, बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, कार्नेल लैब्स ऑफ़ आर्निथोलोजी (यू०एस०ए०), इकोसिस एक्शन फ़ाउन्डेशन (फ़्रांस), एवन वाइल्ड- लाइफ़ ट्रस्ट तथा दुधवा लाइव (पर्यावरण, कृषि एवं सामाजिक मुद्दों पर आधारित एक अंतरराष्ट्रीय जनरल) के सहयोग से 20 मार्च सन् 2010 ई० को मनाया जाना तय हुआ। तबसे प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को गौरैया पुनर्वास और संरक्षण हेतु जागरूकता अभियान के रूप में मनाया जाता है।

देश की राजधानी दिल्ली में तो गौरैया इस कदर दुर्लभ हो गई है कि ढूंढे से भी ये पक्षी नहीं मिलता है, वर्ष 2012 में दिल्ली सरकार ने इसे राज्य-पक्षी घोषित कर दिया है। इसके साथ ही यह बिहार राज्य का भी राज्य पक्षी है। भारतीय डाक विभाग द्वारा 9 जुलाई, 2010 को गौरैया पर जारी किये गए डाक टिकट भी जारी किया। 

आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार भारत में गौरैया की संख्या में करीब 60 फीसदी की कमी आई है। यह कमी ग्रामीण और शहरी, दोनों ही क्षेत्रों में हुई है। ब्रिटेन की ‘रॉयल सोसायटी ऑफ़ प्रोटेक्शन ऑफ़ बर्डस’ ने भारत से लेकर विश्व के विभिन्न हिस्सों में अनुसंधानकर्ताओं द्वारा किए गए अध्ययनों के आधार पर गौरैया को ‘लाल सूची’ में डाला है।

गौरैया पूरे विश्व में तेज़ी से दुर्लभ हो रही है। दस से बीस साल पहले तक गौरैया के झुंड सार्वजनिक स्थलों पर भी देखे जा सकते थे लेकिन खुद को परिस्थितियों के अनुकूल बना लेने वाली यह चिड़िया अब भारत ही नहीं, यूरोप के कई बड़े हिस्सों में भी काफ़ी कम रह गई है। ब्रिटेन, इटली, फ़्राँस, जर्मनी और चेक गणराज्य जैसे देशों में इनकी संख्या जहाँ तेज़ी से गिर रही है, तो नीदरलैंड में तो इन्हें 'दुर्लभ प्रजाति' के वर्ग में रखा गया है।

प्रकृति ने सभी वनस्पतियों और प्राणियों के लिए विशिष्ट भूमिका निर्धारित की है। इसलिए पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि पेड़- पौधों और जीव- जन्तुओं को पूरा संरक्षण प्रदान किया जाए। गौरैया के संरक्षण में मनुष्य की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। गौरैया मात्र एक पक्षी नहीं है, ये हमारे जीवन का अभिन्न अंग भी है। आज गौरैया अपने अस्तित्व के लिए मनुष्यों और अपने आसपास के वातावरण से काफ़ी जद्दोजहद कर रही है। ऐसे समय में हमें स्वार्थ से इतर इनके बारे में सोचना ही होगा और इन पक्षियों के लिए वातावरण को इनके प्रति अनुकूल बनाने में हमें महती भूमिका में आना ही होगा, तभी ये हमारे बीच चहचहायेंगे, वरना यह भी भारत के गिद्ध की तरह पूरी तरह से विलुप्त हो जाएंगे। ये बात हमें हमेशा के लिए अपने ज़हन में घर करनी होगी कि ये भी इस समाज का हिस्सा है वरना सिर्फ 20 मार्च इनके लिए निर्धारित करना महज़ औपचारिकता बनकर ही रह जाएगा।

अंत में बस इतना ही कहूँगा .........यदि ऐसा ही चलता रहा तो मुनव्वर राना का यह शेर भविष्य में आदम जाति पर बिल्कुल सटीक बैठेने वाला है-

ऐसा लगता है कि जैसे खत्म मेला हो गया,

उड़ गई आंगन से चिड़िया घर अकेला हो गया।

                                                                                                                                               अमित वर्मा