भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 3)

भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 3)

भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 3)

नागरिकता (अनुच्छेद 5 से 11)

नागरिकता से अभिप्राय राज्य की पूर्ण राजनीतिक सदस्यता प्राप्त करने से है। एक नागरिक को नागरिक होने के लिए राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं जो अन्य देश के लोगों को नहीं दिए जाते। नागरिक अपने राजनैतिक समूह के सदस्य होते हैं जो मिलकर राज्य का गठन करते हैं। नागरिकता की अवधारणा, गणराज्य की अवधारणा से विशेष रूप से जुड़ी होती है क्योंकि निर्वाचित राष्ट्राध्यक्ष किसी भी देश का प्रथम नागरिक होता है। अनुच्छेद 11 के अंतर्गत संसद को नागरिकता के संबंध में विधि बनाने का अधिकार है।

अनुच्छेद 5 में नागरिकता संबंधी प्रावधान दिया गया है। भारतीय नागरिकता निम्नलिखित प्रकार से प्राप्त की जा सकती है:

  1. जन्म आधारित
  2. वंशानुगत
  3. पंजीकरण द्वारा
  4. देशीयकरण के आधार पर
  5. भूमि के अर्जन द्वारा

किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता का अंत निम्न तीन कारणों से हो सकता है:

  1. अनुच्छेद 9 के तहत किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से ग्रहण करने पर भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त हो जाएगी।
  2. नागरिकता का परित्याग करने पर।
  3. भारत सरकार द्वारा नागरिकता से वंचित करने पर जैसे-
  1. संविधान के प्रति अनादर जताने पर।
  2. युद्धकाल में शत्रु की सहायता करने पर।
  3. पंजीकरण या देशीयकरण नागरिकता के 5 वर्ष के दौरान किसी अन्य देश द्वारा 2 वर्ष की सजा पाने पर।
  4. लगातार 7 वर्षों से भारत से बाहर रहने पर।

भारत द्वारा ब्रिटेन से प्रेरित नागरिकता का एकल स्वरूप अपनाया गया। अपवाद के रूप में जम्मू कश्मीर में दोहरी नागरिकता को मान्यता दी गई है। संसद द्वारा सर्वप्रथम 1955 में नागरिकता संबंधी कानून पारित किया गया। प्रवासी भारतीयों को सीमित रूप से दी जाने वाली दोहरी नागरिकता ओ.सी.आई (ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया)

मूल अधिकार (अनुच्छेद 12 से 35)

लोकतांत्रिक व्यवस्था में मूल अधिकार आधारभूत अधिकार है, जो नागरिकों के नैतिक बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिये अपरिहार्य है। इनके बिना व्यक्ति का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। मूल अधिकार के प्रति नागरिकों को राज्य के विरुद्ध न्यायपालिका का संरक्षण प्राप्त होता है। इस प्रकार मूल अधिकार नागरिकों को न्याय एवं समुचित व्यवहार की सुरक्षा प्रदान करते हैं तथा राज्य के बढ़ते हुए हस्तक्षेप तथा व्यक्ति की स्वतंत्रता के मध्य संतुलन स्थापित करते है।

मूल रूप से संविधान से सात मूल अधिकार प्रदान किए लेकिन संपत्ति के अधिकार को 44वें संविधान 1978 द्वारा मूल अधिकारों की सूची में अनुच्छेद 31 से हटाकर इसे संविधान के भाग 12 में अनुच्छेद 300(क) के तहत विधिक अधिकार बनाया गया है। अतः मूल अधिकारों की संख्या अब 6 है।

अनुच्छेद-12         

  • मूल अधिकारों के प्रयोजन के लिए राज्य शब्द की परिभाषा।

अनुच्छेद-13         

  • मूल अधिकारों से असंगत या उनके अल्पीकरण वाली विधियां शून्य होगी।

समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 से 18)

अनुच्छेद-14         

  • विधि के समक्ष समता।

अनुच्छेद-15         

  • धर्म मूलवंश जाति लिंग अथवा जन्म स्थान के आधार पर भेद का प्रतिबंध।

अनुच्छेद-16         

  • लोक नियोजन में अवसर की समानता।

अनुच्छेद-17         

  • अस्पृश्यता का अंत।

अनुच्छेद-18         

  • उपाधियों का अंत। (सेना व विद्या संबंधी सम्मान को छोडकर)

नोट:- मौलिक अधिकार स्थायी व असीमित नहीं होते। संसद इनमें कटौती कर सकती है। राज्य इन पर प्रतिबंध लगा सकता है लेकिन संविधान के मूल ढांचे को प्रभावित किए बिना। यह वाद योग्य व न्यायोचित होते हैं। जब भी मूल अधिकारों का उल्लंघन होता है यह व्यक्तियों को न्यायालय जाने की अनुमति देते हैं।

स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 से 22)

अनुच्छेद 19         

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से संबंधित।

अनुच्छेद 20         

  • अपराधियों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण।

अनुच्छेद 21         

  • प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार।

अनुच्छेद 21(A)     

  • इसे 86 वें संविधान संशोधन 2002 के तहत जोड़ा गया के अंतर्गत राज्य 6 से 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को निशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा।

अनुच्छेद 22         

  • कुछ मामलों में गिरफ्तारी एवं निरोध से संरक्षण।

शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23 से 24)

अनुच्छेद 23         

  • मानव व्यापार व बलात श्रम का प्रतिषेध।

अनुच्छेद 24          

  • 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों का कारखानों अथवा किसी जोखिमपूर्ण कार्य करवाने का निषेध।

धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 से 28)

अनुच्छेद 25          

  • अंतःकरण धन को अवैध रूप से मान्य एवं प्रचार प्रसार की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 26         

  • धार्मिक संप्रदायों को धार्मिक कार्यों के प्रबंधन की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 27         

  • किसी धर्म को प्रोत्साहित करने हेतु करो से छूट की स्वतंत्रता।

अनुच्छेद 28        

  • कुछ शिक्षण संस्थानों में धार्मिक निर्देशों व उपासना के लिए उपस्थित होने की स्वतंत्रता।

नोट:  अनुच्छेद 25 (1) के अनुसार राज्य लोक व्यवस्था सदाचार स्वास्थ्य के आधार पर व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता पर विधि द्वारा निर्बंधन आरोपित कर सकता अतः अन्य मूल अधिकारों की तरह धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार भी स्थाई नहीं है.

सांस्कृतिक एवं शैक्षिणक अधिकार (अनुच्छेद 29 से 30)

अनुच्छेद 29        

  • अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण।

अनुच्छेद 30         

  • अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी शिक्षण संस्थान खोलने व चलाने का अधिकार।

नोट: अनुच्छेद 29 धार्मिक अल्पसंख्यकों एवं भाषाई अल्पसंख्यको एवं भाषाई दोनों को सुरक्षा प्रदान करता है क्योंकि अनुच्छेद 29 का विस्तार नागरिकों के अनुभाग शब्द का अभिप्राय अल्पसंख्यक एवं बहुसंख्यक दोनों से है जबकि अनुच्छेद 30 में यह व्यवस्था नहीं है। ज्ञातव्य है कि अल्पसंख्यक शब्द को संविधान में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है.

संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32 से 35)

अनुच्छेद  32         

  • अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय में आवेदन।

अनुच्छेद 33         

  • संसद को यह अधिकार है कि वह सशस्त्र बल अर्धसैनिक बल पुलिस बल खुफिया एजेंसियों आदि को निलंबित करने वाली विधि बना सकती है अनुच्छेद 33 के अंतर्गत यह अधिकार केवल संसद को प्राप्त है राज्य विधानमंडल को नहीं।

अनुच्छेद 34:         

  • इस अनुच्छेद के अंतर्गत संसद को भारत के किसी राज्य क्षेत्र में मार्शल लॉ लागू होने पर बनाने का अधिकार है। इस विधि इस अधिकार पर न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती कि यह मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है। मार्शल लॉ के सिद्धांत को ब्रिटिश कानून से लिया गया है। मार्शल लॉ का शाब्दिक अर्थ सैन्य शासन है लेकिन मार्शल लॉ के संदर्भ में संविधान में कोई व्यवस्था नहीं है।

अनुच्छेद 35         

  • इस अनुच्छेद के अंतर्गत संसद को कुछ विशेष मूल अधिकारों को प्रभावी बनाने के लिए कानून बनाने का अधिकार है यह अधिकार राज्य विधानमंडल को प्राप्त नहीं है।

नोट: अनुच्छेद 32 वां अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय उच्च न्यायालय मैं मूल अधिकारों को प्रवर्तित कराने हेतु पांच प्रकार की रिट जारी करने का अधिकार है, जो इस प्रकार हैं:

  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)

    • यह एक ऐसे अधिकारी के विरुद्ध जारी की जाती है, जिसने किसी व्यक्ति को हिरासत में रखा है, उसे सामने प्रस्तुत किया जाए यदि हिरासत में लिए गए व्यक्ति का मामला अवैध है तो उस व्यक्ति को स्वतंत्र किया जा सकता है। इस तरह का रिट किसी व्यक्ति को जबरन हिरासत में रखने के विरुद्ध है।
  2. परमादेश (Mandamus)

    • इस रिट का प्रयोग ऐसे अधिकारी को आदेश देने के लिए किया जाता है जो सार्वजनिक कर्तव्यों के निर्वहन से इंकार या उपेक्षा करता है।
  3. प्रतिषेध (Prohibition)

    • यहां यह रिट वरिष्ठ न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को अपने न्याय क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य करने से रोकने के लिए जारी की जाती है।
  4. उत्प्रेषण (Certiorari)

    • यह रिट उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को अपने लंबित मुकदमों वरिष्ठ न्यायालय में भेजने के लिए जारी की जाती है।
  5. अधिकार पृच्छा (Que Warranto)

    • यह रिट ऐसे व्यक्तियों के विरुद्ध जारी की जाती है, जो किसी लोकपद को अवैध रूप से धारण किए हुए हैं। अतः यह किसी व्यक्ति द्वारा लोक कार्यालय के अवैध अनाधिकार ग्रहण करने से रोकता है।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 भारत 32 संवैधानिक उपचारों के अधिकार को ‘संविधान की आत्मा’ और हृदय कहा है।

राज्य के नीति निर्देशक तत्व (अनुच्छेद 36 से 51)

नीति निर्देशक तत्व लोक कल्याणकारी राज्य निर्माण के साथ- साथ सामाजिक तथा आर्थिक न्याय लक्ष्य प्राप्ति हेतु राज्य के संवैधानिक एवं सकारात्मक कर्तव्य है, लेकिन नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति गैर न्यायोचित है अर्थात इनके हनन पर न्यायालय द्वारा इन्हें लागू नहीं कराया जा सकता यह व्यवस्था अनुच्छेद के तहत है। संविधान के भाग चार शान में इनका वर्णन अनुच्छेद 36 से 51 में है इनकी दशा एवं दिशा के आधार पर अध्ययन की सुविधा के लिए इन्हें 3 वर्गों में बांटा गया है।

आर्थिक एवं सामाजिक वर्गीकरण

अनुच्छेद 38 - राज्य द्वारा जन कल्याण के लिए सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय द्वारा व्यवस्था को सुनिश्चित करना।

अनुछेद 38(क) - जीवन के पर्याप्त साधन का अधिकार।

अनुछेद 38(ख)- सामूहिक हित के लिए समुदाय के भौतिक संसाधनों का स संवितरण।

अनुच्छेद 38(ग)- धन के संकेंद्रण को रोकना।

अनुच्छेद 38(घ)- पुरुष एवं स्त्रियों को समान कार्य करने के लिए समान वेतन।

अनुच्छेद 38(ड़)- कर्मकारों के स्वास्थ्य व शक्ति तथा बालकों की अवस्था के दुरुपयोग से संरक्षण।

अनुच्छेद 38(च)- बालकों को स्वास्थ्य विकास के अवसर।

अनुछेद 39(क)- सामान्य एवं गरीबों को निशुल्क विधिक सहायता उपलब्ध कराना।

अनुच्छेद 41- काम पानी बुढापा बेकारी बीमारी की दशा में लोक सहायता पाने का अधिकार।

अनुच्छेद 42- काम की न्याय संगत तथा मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध।

अनुच्छेद 43- सभी कर्मचारियों के लिए निर्वाह मजदूरी मजदूरी शि सिस्ट जीवन स्तर सुनिश्चित करने के लिए काम की दशाओं   संबंधी अधिकार।

अनुच्छेद 43(क)- उद्योगों के प्रबंधन में कर्मकारों के भाग लेने के लिए कदम उठाना।

अनुच्छेद 47- पोषाहार स्तर व जीवन स्तर को ऊंचा करना लोक स्वास्थ्य का सुधार करना।

गाँधीवादी सिद्धांत:

अनुच्छेद 40- ग्राम पंचायतों का गठन

अनुच्छेद 43- ग्रामीण क्षेत्रों में कुटीर उद्योगों को व्यक्ति या सरकारी आधार पर प्रोत्साहन

अनुच्छेद 43(ख)- सहकारी समितियों के स्वैच्छिक गठन स्वायत्त गठन स्वायत्त संचालन लोकतांत्रिक निमंत्रण तथा व्यवसायिक प्रबंधन को बढ़ावा देना

अनुच्छेद 46- अनुसूचित जाति तथा जनजाति तथा समाज के कमजोर वर्गों के शैक्षणिक एवं आर्थिक हितों को प्रोत्साहन तथा सामाजिक अन्याय व शोषण से सुरक्षा

अनुच्छेद 47- स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक नशीले पदार्थों के उपयोग पर प्रतिबंध

अनुच्छेद 48- गाय बछड़ा व अन्य दुधारू पशुओं की हत्या पर रोक व नस्लों में सुधार को प्रोत्साहन

उदारवादी या उदार बौद्धिक सिद्धांत:

अनुच्छेद 44- भारत के सभी नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता

अनुच्छेद 48- कृषि व पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से करना

अनुच्छेद 48(ए)- पर्यावरण का संरक्षण एवं अन्य वन्य जीवों की रक्षा करना

अनुच्छेद 49- राष्ट्रीय महत्व वाले कलात्मक एवं ऐतिहासिक स्मारकों का संरक्षण

अनुच्छेद 50- राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करना

अनुच्छेद 51- अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि करने का प्रयास

नोट: मूल संविधान के अनुच्छेद 45 में कहा गया है कि राज्य 14 वर्ष तक के बालकों के लिए निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था करेगा।

86 वें संविधान संशोधन 2002 द्वारा इस नीति निदेशक तत्व को स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत मूल अधिकार की स्थिति प्रदान की गई है।

मूल अधिकारों और नीति निदेशक तत्वों के मध्य विभेद:

मूल अधिकार राज्य को कुछ निर्देश देते हैं हर राज्य के किन्ही कार्यों पर प्रतिबंध लगाते हैं, इसलिए राज्य के प्रति इनकी प्रवृत्ति नकारात्मक है जबकि नीति निदेशक तत्व राज्य को कार्य करने के लिए कहते हैं अतः यह सकारात्मक हैं।

मूल अधिकार न्यायोचित होते हैं इनके हनन पर न्यायालय द्वारा इन्हें लागु कराया जा सकता है जबकि नीति निदेशक तत्व गैर न्यायोचित होते हैं इन्हें कानूनी रूप से न्यायालय द्वारा लागू नहीं कराया जा सकता।

मूल अधिकारों का उद्देश्य देश में लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना है जबकि नीति निदेशक तत्वों का उद्देश्य सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना करना है।

मूल अधिकार कानूनी महत्व के हैं जबकि नीति निदेशक तत्व नैतिक सिद्धांत हैं मूल अधिकारों को लागू करने के लिए विधान की आवश्यकता नहीं होती। यह स्वता लागू हैं जबकि नीति निदेशक तत्वों को लागू करने के लिए विधान की आवश्यकता होती है यह स्वता लागू नहीं होते।

नोट: उद्देश्य का मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्व हैं यह सभी समतामूलक समाज के निर्माण तथा सामाजिक आर्थिक व राजनीतिक न्याय की व्रत संकल्पना की नियम है मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्व दोनों ही संविधान की आत्मा है इन के मध्य कोई सारभूत भेद नहीं है और ना ही कोई पारस्परिक विरोध है अतः मूल अधिकार और नीति निदेशक तत्व दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

अनुच्छेद 51() मौलिक कर्तव्य:

नागरिकों के विकास के लिए अधिकार व कर्तव्य दोनों ही महत्वपूर्ण है क्योंकि कर्तव्य पालन से ही व्यक्ति को अधिकारों की प्राप्ति होती है। भारतीय संविधान में अधिकार तो मूल रुप से विद्यमान है परंतु नागरिकों के मूल कर्तव्यों को सरदार स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर 42वें संविधान संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा संविधान का अंग बनाया गया।

इसके अंतर्गत संविधान में भाग 4(ए) तथा अनुच्छेद 51(ए) में मूल कर्तव्य निर्धारित किए गए हैं जो इस प्रकार हैं-

  1. संविधान का पालन करें व उनके आदर्शों संस्थाओं राष्ट्र ध्वज राष्ट्रगान आदि का आदर करें।
  2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखें और उनका पालन करें।
  3. भारत की संप्रभुता एकता और अखंडता की रक्षा करें तथा उसे अक्षुण्ण बनाये रखें।
  4. देश की रक्षा करें और आवाहन किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करें।
  5. भारत के सभी लोगों में समरसता वा सामान भ्रातत्व की भावना का निर्माण करें जो धर्म भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध हो।
  6. प्राकृतिक पर्यावरण जिसके अंतर्गत वन्यजीव नदियां व वन्य जीव आते हैं, की रक्षा करें उसका समर्थन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दया भाव रखें।
  7. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझें और उसका परिरक्षण करें।
  8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण मानववाद ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।
  9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखें और हिंसा से दूर रहें।
  10. व्यक्ति और सामाजिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न व उपलब्धियों की नई ऊंचाइयों को छू सके।

नोट: 6 से 14 वर्ष तक की उम्र के बीच अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करें यह कर्तव्य 86 वें संविधान संशोधन अधिनियम 2002 के द्वारा जोड़ा गया है।

मूल अधिकारों से संबंधित प्रमुख वाद व आधारभूत ढांचे के तत्व

शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ 1951:

  • इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था की कि अनु. 368 के तहत संविधान संशोधन की शक्ति के अंतर्गत मौलिक अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है मौलिक संविधान में संशोधन करना विधि सम्मत प्रक्रिया है।

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य 24 वां संविधान संशोधन अधिनियम 1971:

  • इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था की की संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है और संसद द्वारा किए गए संशोधन अनुच्छेद 13 के अधीन विधि नहीं माने जाएंगे तथा राष्ट्रपति सभी संविधान संशोधनों को मानने के लिए बाध्य होंगे।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य 1973:

  • इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय लिया कि 24 वां संविधान संशोधन विधि सम्मत नहीं है संविधान में संशोधन मौलिक अधिकार सहित हो सकता है लेकिन संविधान के मूल ढांचे पर कोई प्रभाव ना पड़े।

मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ 1980:

  • इस निर्णय में यह बात कही गई कि संविधान संशोधन को न्यायिक जांच की सीमा से बाहर किया जाए। 42वें संविधान संशोधन के कुछ हिस्सों को निरस्त किया गया तथा केशवानंद भारती मामले को दोहराया गया।

संविधान की मूल संरचना के तत्व:

वर्तमान में संसद संविधान के किसी भी भाग में अनुच्छेद 386 के तहत संशोधन कर सकती है लेकिन इससे संविधान की मूल संरचना प्रभावित ना हो विभिन्न मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने निम्नलिखित तत्वों को संविधान का आधारभूत ढांचा घोषित किया है।

  1. संविधान की सर्वोच्चता।
  2. भारतीय राजनीति की सार्वभौम, लोकतांत्रिक तथा गणराज्यात्मक प्रकृति।
  3. संविधान का पंथनिरपेक्ष चरित्र।
  4. शक्तियों का पृथक्करण।
  5. संविधान का संघीय स्वरूप।
  6. राष्ट्र की एकता और अखंडता।
  7. कल्याणकारी राज्य (सामाजिक आर्थिक न्याय)।
  8. व्यक्ति की स्वतंत्रता एवं गरिमा।
  9. न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति।
  10. विधि का शासन।
  11. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव।
  12. संसदीय शासन प्रणाली।
  13. मौलिक अधिकारों तथा नीति निदेशक सिद्धांतों के बीच सौहार्द एवं संतुलन।
  14. न्यायपालिका की स्वतंत्रता
  15. न्याय तक प्रभावकारी पहुंच।
  16. संसद की संविधान संशोधन की सीमित शक्ति।
  17. संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्य।
  18. तर्कसंगतता का सिद्धांत।
  19. अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 136, अनुच्छेद 144 तथा अनुच्छेद 142 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियां।

 

भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 1) पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें!

भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 2) पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें!

महत्वपूर्ण समसामयिकी 2017-2018 (भाग- 1) पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें!

महत्वपूर्ण समसामयिकी 2017-2018 (भाग- 2) पढ़ने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें!