भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 4)

भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 4)

भारतीय संविधान एवं राजव्यवस्था (भाग- 4)

संघीय कार्यपालिका एवं विधायिका:

भारत का राष्ट्रपति:

भारतीय संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 52 से लेकर के 78 तक संघ की कार्यपालिका का वर्णन है। संघ की कार्यपालिका में राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति प्रधानमंत्री तथा महान्यायवादी शामिल होते हैं। भारत में संघीय कार्यपालिका का प्रधान राष्ट्रपति है तथा संघ की सभी कार्यपालिका शक्तियां उसमें निहित है। भारत में संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया है अतः राष्ट्रपति सिर्फ नाम मात्र की कार्यपालिका है तथा वास्तविक कार्यपालिका प्रधानमंत्री एवं उसके मंत्रिमंडल में निहित है।

राष्ट्रपति पद हेतु योग्यताएं:

अनुच्छेद 58 के अंतर्गत राष्ट्रपति पद हेतु निम्न योग्यताओं को पूर्ण करना आवश्यक है।

  1. वह भारत का नागरिक हो।
  2. वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो।
  3. लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।
  4. वह किसी लाभ के पद पर ना हो।

राष्ट्रपति का चुनाव:

नामाँकन: 50 सदस्य प्रस्तावक के रूप में वह 50 सदस्य अनुमोदन करें।

निर्वाचक मंडल: अनुच्छेद 54 में राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल का जिक्र है जिसके अनुसार राष्ट्रपति के निर्वाचन में संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य तथा 70वें संविधान संशोधन 1992 द्वारा केंद्र शासित प्रदेशों में दिल्ली व पांडिचेरी की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य शामिल होते हैं। भारत के राष्ट्रपति का चुनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व के अनुसार एकल संक्रमणीय मत और गुप्त मतदान द्वारा होता है।

  • संसद के प्रत्येक के निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्य = सभी राज्यों के विधायकों के मत का कुल योग/ संसद के निर्वाचित सदस्यों की कुल सदस्य संख्या
  • राज्य की विधानसभा के प्रत्येक के निर्वाचित सदस्य के मत का मूल्य = (राज्य की कुल जनसंख्या / राज्य विधानसभा के निर्वाचित कुल सदस्य) ×1/100

नोट: राष्ट्रपति निर्वाचन संबंधित विवादों की जांच उच्चतम न्यायालय में होती है।

राष्ट्रपति की शक्तियां

कार्यकारी शक्तियां:

  1. अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी तथा अनुच्छेद 77 के अनुसार सरकार की समस्त कार्यपालिका कृत्य राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं।
  2. अनुच्छेद 78 के अनुसार राष्ट्रपति को संघ के मामले में सूचना प्राप्त करने का अधिकार है। अनुच्छेद 74 के तहत राष्ट्रपति परामर्श व सहयोग के लिए एक मंत्रिपरिषद का गठन करता है, जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है वह प्रधानमंत्री के अतिरिक्त संघ के अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है जो उसके प्रसादपर्यंत कार्य करते हैं।
  3. अनुच्छेद 107 के तहत राष्ट्रपति आकस्मिक या असाधारण परिस्थितियों में राज्यपाल के कृत्यों के निर्वहन हेतु उपबंध बना सकता है।
  4. राष्ट्रपति अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गों के लिए एक आयोग की नियुक्त कर सकता है वह किसी भी क्षेत्र को अनुसूचित क्षेत्र घोषित कर सकता है उसे अनुसूचित और जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन की शक्तियां प्राप्त हैं।

नोट: इन शक्तियों का प्रयोग राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह पर ही करता है।

विधायी शक्तियां:

  1. अनुच्छेद 85 के अंतर्गत राष्ट्रपति संसद के अधिवेशन को बुलाने स्त्रावसान (कुछ समय के लिए रोकने) तथा लोकसभा को भंग करने की शक्ति प्राप्त है।
  2. अनुच्छेद 87 के अंतर्गत राष्ट्रपति लोकसभा के प्रत्येक आम चुनाव के पश्चात प्रथम सत्र के आरंभ में तथा प्रत्येक वर्ष प्रथम सत्र के आरंभ में संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक को संबोधित करता है। अनुच्छेद 108 के अंतर्गत यदि किसी साधारण विधेयक पर संसद के दोनों सदनों में मतभेद हो तो राष्ट्रपति ऐसे विधायक को वापस करने के लिए संयुक्त अधिवेशन बुला सकता है।
  3. अनुच्छेद 331 के तहत राष्ट्रपति लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय के 2 प्रतिनिधियों को मनोनीत कर सकता है। इसी प्रकार राज्यसभा में अनुच्छेद 80 के तहत राष्ट्रपति साहित्य विज्ञान कला समाज सेवा आदि से संबंधित 12 सदस्य मनोनीत कर सकता है।
  4. संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति की अनुमति के बाद ही कानून बनता है धन विधेयक तथा संविधान संशोधन विधेयक को छोड़कर अनुच्छेद 111 के तहत संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक जब राष्ट्रपति के पास अनुमति के लिए रखा जाता है तो वह उस पर अपनी अनुमति दे सकता है अनुमति नहीं भी दे सकता है तथा उसे पुनर्विचार के लिए वापस भी कर सकता है।
  5. अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति संसद के सत्रावसान की अवधि में अध्यादेश जारी कर सकता है या अध्यादेश संसद की पुनः बैठक के 6 हफ्तों के भीतर संसद द्वारा अनुमोदित करना आवश्यक है राष्ट्रपति किसी अध्यादेश को किसी भी समय वापस ले सकता है।

वित्तीय शक्तियां:

  1. राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना धन विधेयक वित्तीय विधेयक तथा अनुदान मांगे लोकसभा में प्रस्तावित नहीं की जा सकती। अनुच्छेद 112 के अनुसार राष्ट्रपति प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ में संसद के दोनों सदनों में भारत सरकार की उस वर्ष के लिए आय और व्यय का विवरण अर्थात बजट रखता है।
  2. भारत की आकस्मिक निधि पर राष्ट्रपति का नियंत्रण होता है वह आकस्मिक व्यय के लिए इससे निधि से धनराशि दे सकता है इसके लिए बाद में संसद की स्वीकृति आवश्यक है।
  3. अनुच्छेद 280 के तहत राष्ट्रपति केंद्र व राज्य के मध्य राजस्व के बंटवारे के लिए प्रत्येक 5 वर्ष में 1 वित्त आयोग का गठन करता है।

न्यायिक शक्तियां:

  1. राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के किसी विधि पर सलाह ले सकता है परंतु राष्ट्रपति यह सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं है।
  2. अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्रदान की गई है राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति एक कार्यकारी शक्ति है जो न्यायपालिका से स्वतंत्र है। राष्ट्रपति अपनी इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है अतः राष्ट्रपति किसी अपराध के लिए दोषसिद्धि व्यक्ति को दंड को क्षमा कर सकता है अथवा प्रतिलंब परिहार विराम या लघुकरण कर सकता है।
  3. राष्ट्रपति को सभी प्रकार के मृत्यु दंडादेश वाह कोर्ट मार्शल (सैन्य न्यायालय) के मामले में भी क्षमादान की शक्ति प्राप्त है लेकिन राज्यपाल को यह शक्ति प्राप्त नहीं है।

नोट: राष्ट्रपति को अनुच्छेद 124 के तहत उच्चतम न्यायालय व अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार है वह उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 145 के तहत निर्मित किए जाने वाले न्यायालय की पद्धति से संबंधित नियमों को अनुमोदित करता है।

 कूटनीतिक शक्तियां:

  • अंतर्राष्ट्रीय संधियां व समझौते राष्ट्रपति के नाम पर किए जाते हैं इसके लिए संसद की स्वीकृति अनिवार्य है राष्ट्रपति वैदेशिक क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व करता है और कूटनीतिज्ञों जैसे राजदूतों व उच्चायुक्तों को भेजता है एवं उनका स्वागत करता है।

सैन्य शक्तियां:

  • भारत का राष्ट्रपति अनुच्छेद 53 (बी) के अनुसार तीनों सेनाओं यानी कि थलसेना वायुसेना नौसेना का प्रधान सेनापति होता है वह इन तीनों सेनाओं के अध्यक्षों की नियुक्ति करता है वह युद्ध या उसकी समाप्ति की घोषणा करता है किंतु यह संसद की अनुमति के अनुसार होता है।

आपातकालीन शक्तियां:

  • राष्ट्रपति को तीन परिस्थितियों में आपातकालीन शक्तियां प्रदान की गई हैं
  • राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352)
  • राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356)
  • वित्तीय आपातकाल (अनुच्छेद 360)

राष्ट्रपति की वीटो पावर

अत्यांतिक वीटो या पूर्ण वीटो:

  • जब किसी विधेयक पर राष्ट्रपति अपनी अनुमति नहीं देता तब विधेयक का अस्तित्व समाप्त हो जाता है। इसे अत्यांतिक वीटो या पूर्ण वीटो कहा जाता है। इस वीटो शक्ति का प्रयोग गैर सरकारी सदस्यों के विधायक (संसद का वह सदस्य जो मंत्री ना हो) के संबंध में होता है।

निलंबनकारी वीटो:

  • राष्ट्रपति इस वीटो का प्रयोग तब करता है जब वह किसी विधेयक को संसद के पुनर्विचार हेतु लौट आता है लेकिन यदि संसद उस विधेयक को पुनः किसी संशोधन अथवा बिना संशोधन के साथ पारित कर राष्ट्रपति को भेजती है तो उस पर राष्ट्रपति अनुमति देने को बाध्य होता है।

पॉकेट वीटो:

  • इस मामले में राष्ट्रपति विधेयक पर न तो कोई सहमति देता है और न अस्वीकृत करता है और न ही लौटाता है परंतु एक अनिश्चित काल के लिए विधेयक को लंबित कर देता है। राष्ट्रपति की विधेयक पर किसी भी प्रकार का निर्णय न देने की शक्ति पॉकेट वीटो कहलाती है। इस शक्ति का सर्वप्रथम प्रयोग राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने 1986 में भारतीय डाक संशोधन विधेयक के संदर्भ में किया था।

राष्ट्रपति पर महाभियोग:

  • अनुच्छेद 61 के अनुसार राष्ट्रपति द्वारा संविधान का उल्लंघन करने पर महाभियोग चलाकर उसे पद से हटाया जा सकता है। राष्ट्रपति की पदावधि 5 वर्ष तक होती है लेकिन वह अपनी पदावधि में किसी भी समय अपना त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को दे सकता है।
  • महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। इस प्रस्ताव की सूचना राष्ट्रपति को 14 दिन पूर्व प्राप्त होनी चाहिए। इस प्रस्ताव की सूचना पर कम से कम ¼ सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए। संसद के एक सदन में आरोप लगाया जाता है तथा दूसरे द्वारा इसकी जांच की जाती है यदि दूसरे सदन में भी ⅔ सदस्य इसे पारित कर देते हैं तो उसी समय राष्ट्रपति अपने पद से हटा हुआ माना जाता है।
  • राष्ट्रपति के विरुद्ध इस महाभियोग की प्रक्रिया में संसद के दोनों सदनों के नामांकित सदस्य भाग लेते हैं। राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य तथा दिल्ली व पांडुचेरी केंद्र शासित विधानसभाओं के सदस्य इस प्रक्रिया में भाग नहीं लेते।

नोट:

  • संसद का गठन राष्ट्रपति लोकसभा तथा राज्यसभा से मिलकर होता है, इस प्रकार राष्ट्रपति संसद का अंग होता है लेकिन वह संसद के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होता।
  • राष्ट्रपति को शपथ उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश दिलाता है। मुख्य न्यायाधीश की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति को शपथ उच्चतम न्यायालय का जेष्ठतम न्यायाधीश शपथ दिलाता है।
  • जब राष्ट्रपति का पद उसके कार्यकाल के दौरान रिक्त हो तो उस पद को भरने के लिए 6 माह के भीतर चुनाव आवश्यक है। राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा। उपराष्ट्रपति का पद रिक्त हो तो भारत का मुख्य न्यायाधीश कार्यवाहक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करेगा।

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