वायु प्रदूषण की समस्या (विश्व पर्यावरण दिवस पर खास)

वायु प्रदूषण की समस्या (विश्व पर्यावरण दिवस पर खास)

वायु प्रदूषण की समस्या (विश्व पर्यावरण दिवस पर खास)

प्रकृति ने मानव के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए प्रत्येक अनुकूलता वह पर्याप्त संसाधन दे रखे हैं। प्रकृति ने फलों एवं खाद्यान्न की व्यवस्था कर रखी है। सांस लेने के लिए ऑक्सीजन तो पीने के लिए व अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पानी दिया है। इसके अतिरिक्त रहने और अन्य अनेक प्रकार की आवश्यकताओं के लिए उपजाऊ भूमि भी उपलब्ध करा रखी है।

मानव सभ्यता के लिए इतना सब कुछ करने के बाद भी प्रकृति मनुष्य से कोई खास अपेक्षा नहीं रखती। सिवाय इसके कि उसके रुप स्वरुप व रंगत से छेड़छाड़ न की जाए, उसे यथावत रहने दिया जाए। लेकिन समय के साथ-साथ मानव की महत्वकांक्षाएं बढ़ती गई। मानव विकास की अदाधुंध दौड़ ने पानी को सुखा दिया। जंगलों को काटकर धरती के आभूषण को लूट लिया तथा जमीन को बंजर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। हवा को विषैला बना दिया गया। कुल मिलाकर प्रकृति की इस उम्मीद पर हम खरे नहीं उतर पाए अतः जैसा व्यवहार हमने प्रकृति के साथ किया परिणाम स्वरुप वैसा ही फल हम भोग रहे हैं।

आज हमारे शहरों की आबोहवा बिगड़ रही है। सड़कों पर दौड़ते अनगिनत वाहनों व इनकी बढ़ती हुई संख्या ने हमारे वायुमंडल की प्राणवायु में जहर घोल कर मनुष्यों को ही नहीं बल्कि धरा पर निवासित अन्य जीवों को भी अंदर से खोखला बना दिया है। एक समय था जब लोग गांव से शहर घूमने तथा बसनें आया करते थे। लेकिन आज स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि लोग शहरों से गांव की ओर पलायन करने की सोच रहे हैं। बड़े व औद्योगिक शहरों के साथ-साथ छोटे व कम आबादी वाले शहरों की भी आबोहवा तेजी से बिगड़ रही है। हमने अपने ही शहरों को गैस की भट्टी बना दिया है जिसमें सांस लेना ही सांसो के लिए खतरा बन गया है।

अभी हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 180 देशों के 4300 शहरों की वायु गुणवत्ता का आकलन किया, जिसमें सबसे ज्यादा वायु प्रदूषण वाले शीर्ष 15 देशों की सूची में 14 शहर भारत के ही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 108 देशों के 4300 शहरों में यह अध्ययन पीएम 10 और पीएम 2.5 की वार्षिक औसत मात्रा पर किया।

विश्व के 15 सबसे प्रदूषित शहर:

क्र. सं. शहर PM2 (प्रदूषण स्तर)
01 कानपुर 173 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
02 फरीदाबाद 172 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
03 वाराणसी 151 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
04 गया 149 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
05 पटना 144 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
06 दिल्ली 143 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
07 लखनऊ 138 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
08 आगरा 131 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
09 मुजफ्फरनगर 120 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
10 श्रीनगर 113 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
11 गुरुग्राम 113 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
12 जयपुर 105 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
13 पटियाला 101 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
14 जोधपुर 98 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर
15 अली सुबाह अल सलीम 94 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर

 

पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार पीएम 10 को रेस्पाइरेनल पार्टिकुलेट मैटर कहते हैं इन कणों के आकर 10 माइक्रोमीटर होता है। इससे छोटे कणों का व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या इससे भी कम होता है, जिसमें धूल व् धातु के सूक्ष्म कण शामिल होते हैं जो निर्माण कार्य व कूड़ा से अधिक बढ़ता है पीएम 2.5 हवा में घुलनशील छोटे पदार्थ है, जो सांस लेते वक्त हमारे फेफड़ों में प्रवेश कर जाते हैं तथा इनको रोकने के लिए हमारे शरीर में कोई भी तंत्र नहीं है। 

पीएम 10 का सामान्य स्तर 100 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर होना चाहिए जबकि देश के अधिकांश शहरों में वायु प्रदूषण अपने निर्धारित मानकों से कहीं ज्यादा है। ऐसे खतरनाक सूक्ष्म कण हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं। लगातार उनके संपर्क में रहने पर फेफड़ों का कैंसर भी हो सकता है।

राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक (नेशनल एयर क्वालिटी इंडेक्स)

भारत सरकार ने 6 अप्रैल 2015 को नई दिल्ली में राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक जारी किया जो देश के 10 प्रमुख शहरों दिल्ली, आगरा, कानपुर, लखनऊ, वाराणसी, फरीदाबाद, अहमदाबाद, चेन्नई, बेंगलुरु और हैदराबाद में वायु प्रदूषण के स्तर को 6 मानकों में अलग-अलग रंगों में प्रदर्शित करेगा।

ए क्यू आई गुणवत्ता रंग कोड स्वास्थ्य पर असर
01 से 50 अच्छी गहरा हरा कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं
51 से 100 संतोषजनक हल्का हरा संवेदनशील लोगों को सांस लेने में तकलीफ
101 से 200 मध्यम पीला हृदय रोगियों को कठिनाई
201 से 300 खराब गुलाबी अधिकांश लोगों को सांस लेने में कठिनाई
301 से 400 बहुत खराब हल्का लाल अधिक समय तक रहने से सांस लेने में कठिनाई
401 से 500 खतरनाक गहरा लाल स्वास्थ्य लोगों पर भी गंभीर प्रभाव

 

वायु गुणवत्ता सूचकांक के साथ ही भारत अमेरिका चीन मेक्सिको फ्रांस और हांगकांग जैसे देशों में भले ही शामिल हो गया हो लेकिन वायु प्रदूषण से लड़ने के लिए जो प्रतिबद्धता दिखनी चाहिए वह नहीं दिख रही। विश्व के जिन देशों ने अपने यहां यह प्रणाली लागू की है वह न सिर्फ इसके लिए चेतावनी जारी करते हैं बल्कि प्रदूषण स्तर कोर्ट नीचे लाने के लिए व्यापक उपाय भी करते हैं।

उत्तर प्रदेश का कानपुर शहर विश्व का सबसे प्रदूषित शहर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार विश्व में 10 में से 9 लोग सांस लेते समय हवा के साथ बड़ी मात्रा में प्रदूषित पदार्थ ले रहे हैं घरेलू और बाहरी प्रदूषण से भारत में प्रतिवर्ष 2400000 लोगों की मौत होती है जो कि विश्व में होने इससे होने वाली मौतों का कुल 30 प्रतिशत हैं। विश्व में खाना बनाने वाले ईंधन एवं घरेलू उपकरणों से फैलने वाले प्रदूषण से विश्व में 3800000 लोगों की मौत हुई।

इसी वर्ष के आरंभ में ग्रीनपीस इंडिया ने 280 भारतीय शहरों के आंकड़ों को शामिल करके कहा था कि देश के 80% शहरों की हवा सांस लेने योग्य नहीं है। इसी वर्ष के आरंभ में राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण अपने खतरनाक स्तर पर पहुंच गया तथा स्थिति इतनी बिगड़ गई थी कि वायु प्रदूषण मापने वाला इंडेक्स ही काम नहीं कर रहा था।

इन भयानक आंकड़ों को देखकर कथित विकास के पीछे विनाश की आहट धीरे-धीरे दिखाई और सुनाई देने लगी है। देश में अनगिनत राजनीतिक दल है जो हर समय विकास के गीत गाते रहते हैं लेकिन हैरानी तो यह है कि आम नागरिक से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्यावरण संबंधी मुद्दा किसी भी राजनीतिक दल के चुनावी घोषणा पत्र में शामिल ही नहीं हुआ और ना ही किसी भी चुनाव में मुद्दा बन सका।

इन आंकड़ों को देखकर धरती के जीवन के अस्तित्व पर खतरे की आहट सुनी जा सकती है और ऐसी स्थिति तब है जब भारत को स्वच्छ बनाने की मुहिम राष्ट्रीय स्तर पर जोर शोर से चलाई जा रही है, क्या स्वच्छ भारत मिशन का सपना केवल खुले में शौचालय मुक्त भारत बनाना ही मात्र है? इसका विस्तार प्रदूषण मुक्त भारत बनाना भी होना चाहिए और इसके लिए हमें पूरी तरह से सरकार पर निर्भर नहीं होना चाहिए। कहीं ना कहीं एक जागरूक नागरिक के तौर पर पर्यावरण के प्रति खुद की भी जिम्मेदारी तय करनी होगी। स्वच्छ वायु सभी जीवों के लिए अत्यंत आवश्यक है, इसके बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती ऐसे में हमारे शहरों को स्वस्थ पर्यावरण लौटाने का ऋण हमारी सरकार व समाज के ऊपर है। अभी से जुट कर हम प्रकृति को नहीं बचाएंगे तो प्रकृति भी हमें नहीं बचाएगी जब। जागो, तभी सवेरा।

विश्व पर्यावरण दिवस पर इस वर्ष की थीम: Beat Plastic Pollution.

लेखक:
शशांक शेखर भदौरिया
शैक्षिक योग्यता- बी एस सी
निवास- जिला: मैनपुरी (उत्तर- प्रदेश)