वन हैं प्रकृति के रक्षक (21 मार्च: विश्व वन दिवस)

वन हैं प्रकृति के रक्षक (21 मार्च: विश्व वन दिवस)

वन हैं प्रकृति के रक्षक (21 मार्च: विश्व वन दिवस)

वर्ष 2018 का मुख्य विषय: वन और सतत शहर (फॉरेस्ट एंड सस्टेनेबल सिटीज)

वनों का जिक्र आते ही मेरे हृदय में एक ऐसी तस्वीर उभरकर आती है जिसकी कल्पना मात्र से ही प्रकृति से निकटता की अनुभूति होने लगती है। वन अर्थात ऐसा क्षेत्र जहां प्रकृति ने अपनी इस हरी पृष्ठभूमि पर विविधता का वर्णन किया है। जहां पर प्रकृति जीव जंतुओं, वृक्ष व पेड़ पौधों की विभिन्न प्रजातियों को समेटे हुए हैं, उनके निवास स्थान को स्वयं में संजोए हुए हैं।

विभिन्न प्रकार के घने वृक्ष, पेड़- पौधों व जीवों से समाहित ऐसा प्राकृतिक परिवेश जहां पर वनस्पतियों और जीवों की विशालता, विविधता अपना जीवन व्यतीत करती है वह वन कहलाता है। पृथ्वी के विभिन्न भागों में तीन प्रकार के वन पाए जाते हैं: 

  • वर्षा वन
  • शंकुधारी वन और 
  • पर्णपाती वन

वनों का यह प्रकार उस भू-भाग की जलवायु व अन्य कारकों पर निर्भर करता है। वन हैं, तो हम हैं! वनों के अस्तित्व के कारण ही हम सभी जीवों का अस्तित्व संभव है क्योंकि वह हमारे भौगोलिक पारिस्थितिकी तंत्र का केंद्र होते है।

इतिहास के गर्त में जा कर देखा जाए तो आरम्भिक काल में मनुष्य भी अन्य जीवों की तरह वनों में ही रहता था तथा शिकार करता था। पर्यावरण तथा विकास एक दूसरे पर निर्भर हैं। मानव भोजन, वस्त्र आश्रय व ऊर्जा के लिए इसी पर निर्भर है। विकास का पहिया घूमने के बाद दूसरे पशुओं के विपरीत मानव औजार बनाने वाला, भोजन पका कर खाने वाला व क्रमबद्ध विकास की ओर अग्रसर होने वाला एकमात्र जीव है।

कई हजार सालों तक सब ठीक चलता रहा लेकिन धीरे-धीरे मानवी आबादी व आकांक्षाएं विस्तार करने लगी। अपने प्रौद्योगिकी विकास के जरिए मानव प्रकृति के प्रमुख तीन संसाधनों जल, जंगल और जमीन का अदा धुंध दोहन करने लगा। पेड़ों को काटकर धरती के आभूषण को लूटने लगा। विनाश की नींव पर विकास की इमारत खड़ी करने लगा।

बढ़ती इंसानी आबादी के अस्तित्व के कारण प्राकृतिक संसाधन कम पड़ने लगे। परिणाम स्वरुप सहजीवी रिश्ते दरक गए। पेड़- पौधों व वनों को भारी मात्रा में काटा जाने लगा। जो पेड़- पौधे वातावरण को शुद्ध करते थे अब उन के अभाव में धरती पर प्राकृतिक आपदाएं व हमारे वायुमंडल में जहरीली हवा घुलने लगी। जहां कुछ साल पहले घने जंगल हुआ करते थे आज वहां कंक्रीट की दीवारें स्थापित हो गई हैं मौसम बदल रहा है नई-नई बीमारियां दम घोंट रही हैं इन सभी हालातों का एकमात्र कारण है प्रकृति के नियम से की गई छेड़छाड़।

मनुष्य ने अपने स्वार्थों के लिए प्राकृतिक संसाधनों मुख्य रूप से जल जंगल और जमीन को इतना दोहन किया कि मनुष्य प्रकृति के इन तीनों तत्वों से अलग होता चला गया। वन जो हमारे अस्तित्व के आधार हैं आज वनों के अस्तित्व पर ही हम मनुष्य सबसे बड़ा खतरा बने हुए हैं। आज इस क्षति की भरपाई के लिए राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर ऊपर कोशिशें की जा रही हैं।

विश्व वानिकी दिवस मनाने का विचार सर्वप्रथम 1971 में यूरोपीय कृषि परिसंघ की 23वीं महासभा में आया। 21 दिसम्बर 2012 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रतिवर्ष 21 मार्च को याद दिवस मनाए जाने की घोषणा की। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य लोगों को वनों का महत्व बताना, वन संरक्षण के प्रति जागरुकता बढ़ाना तथा वर्तमान व भावी पीढ़ी के लिए धारणीय विकास को सुदृढ़ बनाना है।

हमारे देश में भी वनों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए समय समय पर सरकारों द्वारा नीतियां व परियोजनाएं संपन्न होती रहती हैं। भारत में प्रत्येक 2 वर्ष के अंतराल में भारत वन स्थिति रिपोर्ट जारी की जाती है। हाल ही में 12 फरवरी 2018 को नई- दिल्ली के केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2017 को सार्वजनिक किया।

भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2017 के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं:

  • इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल वनावरण 708273 वर्ग किलोमीटर है, जो की देश के कुल वन क्षेत्र का 21.54 प्रतिशत है। देश में कुल वन और पेड़ों के आवरण में 8000 वर्ग किलोमीटर से अधिक की वृद्धि हुई है। वर्ष 2015 की तुलना में यह वृद्धि 1.14 प्रतिशत की है। 
  • इस रिपोर्ट के अनुसार देश में कुल वनावरण एवं पर्यावरण 802088 वर्ग किलोमीटर है जो देश की भौगोलिक क्षेत्र का कुल 24.39 प्रतिशत है। देश में सघन वन में 1.36 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 
  • इस रिपोर्ट के अनुसार वन क्षेत्र के संदर्भ में भारत विश्व के शीर्ष 10 देशों में शामिल है। भारत को विश्व के उन 10 देशों में 8वां स्थान दिया गया है, जहां वार्षिक स्तर पर वन क्षेत्र में सर्वाधिक वृद्धि दर्ज हुई है।
  • भारत के भू भाग का 24.4 प्रतिशत भाग वनों व पेड़ों से घिरा हुआ है जो विश्व के कुल भू-भाग का केवल 2.4 प्रतिशत है।
  • इस रिपोर्ट के अनुसार देश का सबसे बड़ा वन क्षेत्र मध्यप्रदेश में पाया गया है। मध्य प्रदेश में कुल वनावरण 77414 वर्ग किलोमीटर है, इसके बाद दूसरे स्थान पर अरुणाचल प्रदेश 66964 वर्ग किलोमीटर तथा तीसरे स्थान पर छत्तीसगढ़ 55547 वर्ग किलोमीटर है।
  • रिपोर्ट के अनुसार आंध्र- प्रदेश के वनावरण में 2141 वर्ग किलोमीटर की सर्वाधिक वृद्धि दर्ज हुई है। इसके बाद दूसरे स्थान पर कर्नाटक 1101 वर्ग किलोमीटर तथा तीसरे स्थान पर केरल 1043 वर्ग किलोमीटर है। 
  • रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल बांस धारित क्षेत्र 15.69 मिलियन हेक्टेयर का है। वर्ष 2011 की तुलना में देश के बांस धारित क्षेत्र में 1.73 मिलियन हेक्टेयर की वृद्धि हुई है। हाल ही में केंद्र सरकार ने संसद में बांस को वृक्ष की श्रेणी से बाहर करने के संदर्भ में बिल प्रस्तुत किया।
  • रिपोर्ट के अनुसार भारत में मैंग्रोव क्षेत्र विश्व की संपूर्ण मैंग्रोव वनस्पति का 3.3% है भारत में मैंग्रोव क्षेत्र 4921 किलोमीटर तक फैला हुआ है, जो देश की कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है। भारत में सर्वाधिक मैंग्रोव आधारित चार राज्य, पश्चिम बंगाल 2114 वर्ग किलोमीटर, गुजरात 1140 वर्ग किलोमीटर, अंडमान निकोबार दीप समूह 617 वर्ग किलोमीटर तथा आंध्र प्रदेश 404 वर्ग किलोमीटर है।
  • उत्तर प्रदेश का कुल वनावरण 240928 वर्ग किलोमीटर है जो देश के भौगोलिक क्षेत्र का 7.33 प्रतिशत है।
  • रिपोर्ट के अनुसार सर्वाधिक वनावरण प्रतिशतता लक्ष्यदीप 90.33% में है। इसके बाद दूसरे स्थान पर मिजोरम 86.27% तीसरे स्थान पर अंडमान व निकोबार दीप समूह 81.73% है।

भारत में वन स्थिति के संदर्भ में उपर्युक्त रिपोर्ट में जारी आंकड़ों का अगर पिछली रिपोर्टों से तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो वर्तमान आंकड़े संतोषजनक प्रतीत हो रहे हैं लेकिन फिर भी वन संरक्षण को लेकर अभी काफी प्रयास करने शेष हैं। आज चिंता सिर्फ इस बात की है कि विकास के लिए काटे गए पेड़ों की क्षतिपूर्ति कैसे की जाए ! इसके लिए देशभर में पौधरोपण अभियान चलाए जा रहे हैं।

पौधरोपण के अभियान में प्रत्येक व्यक्ति को भाग लेना चाहिए व लगाए गए पौधों की जिम्मेदारी सरकार पर न थोपकर खुद उठानी चाहिए। पेड़ों की पत्तियों टहनियां व शाखाएं शोर को सोखती हैं, तेज बारिश का वेग धीमा कर मृदा क्षरण को रोकती हैं, पेड़ों की पत्तियां वायु में मौजूद हानिकारक तत्वों को छानने में सक्षम होती हैं तथा वाष्पोत्सर्जन क्रिया द्वारा वातावरण को नम रखती हैं। पेड़ों की जड़ें मृदा के क्षरण को रोकती हैं। 

पेड़ वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड सोखकर ऑक्सीजन प्रदान करते हैं एक एकड़ में लगे उतना कार्बन सोखने में सक्षम है जितना एक कार 26000 मील चलने में उत्सर्जित करती है। खुद को कीटों से बचाने के लिए पेड़ पौधे फाइरोनसाइड हवा में छोड़ते हैं। सांस के माध्यम से जब यह रसायन हमारे शरीर में पहुंचते हैं तो हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ जाती है। अगर हम प्रकृति से यह सेवा ले रहे हैं तो हमारा भी दायित्व है प्रकृति का ध्यान रखना। प्रत्येक व्यक्ति को अपने हिस्से की ऑक्सीजन के लिए पौधरोपण करना चाहिए।

 हमारे पेड़ों का संरक्षण! हमारे  भविष्य का संरक्षण!

 

  लेखक:

  शशांक शेखर भदौरिया

  शैक्षिक योग्यता- बी एस सी

  निवास- जिला: मैनपुरी (उत्तर- प्रदेश)